Rajeev is from Steel City, Jamshedpur. Studied Medicine from RIMS, Ranchi, worked in Army Medical Corps for 7 years. Currently a physician in NHS, UK. Active in Social Media since 2009 and was motivated to use Social media as a valid alternative by a strong scepticism towards the mainstream media. His ideological journey started from leftism to Gandhism to Strong Nationalism to complete the full spectrum resulting in being a regular writer for Virat Hindu Rashtra Blog.

अम्बानी-अडानी ने दी है टाटा-बिरला को राहत

अम्बानी-अडानी ने दी है टाटा-बिरला को राहत
हर रोज कोई ना कोई आ ही जाता है जिसे अम्बानी-अडानी की संपत्ति से शिकायत है. जिसकी शिकायत है कि अम्बानी-अडानी को फायदा हो रहा है… शिकायत की आदत पुरानी है. जब हम छोटे थे तो यही सारे मुहावरे टाटा-बिरला के नाम से सुनते थे. अम्बानी-अडानी ने टाटा-बिरला को राहत दी है.स्कूल में अर्थशास्त्र नाम का विषय पढ़ा था. वह 80 का दशक था, समाजवादी स्वप्न का स्वर्णिम दौर. स्कूल की किताबों से लेकर सिनेमा के पर्दे तक समाजवाद छलकता रहता था. सिनेमा में जब अमिताभ बच्चन कुली बनता था, मजदूरों के हक़ के लिए खून चूसने वाले मिल
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ओशो अनुभूति मात्र हैं : वे शब्द नहीं, भाषा नहीं, नाद हैं, संगीत हैं, शून्य हैं

ओशो अनुभूति मात्र हैं : वे शब्द नहीं, भाषा नहीं, नाद हैं, संगीत हैं, शून्य हैं
घर से हस्पताल रोज एक घंटे अप और एक घंटे डाउन का रास्ता कैसे कटे कि समय ना अखरे… ग़ज़ल सुने, भजन सुने, पॉडकास्ट पर कुछ कुछ सुना… कुछ ई-बुक्स डाउनलोड करने की सोच ही रहा था कि एक दिन संयोग से ओशो की एक स्पीच दिख गई.ओशो की क्या स्मृतियाँ हैं आपके पास? मन में क्या छवि है? मुझे तो जो हल्का सा याद है कि मिडिल स्कूल में था, 80s की बात है जब वे खबरों में आये थे. जब अमेरिका में उन्हें किसी आरोप में अरेस्ट कर लिया गया था. तब के अखबारों, पत्रिकाओं में पढ़ी बातों पर जो छवि बनी थी वह ही जमी रही मन में – और सच कह
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सरकार, उस मरीज़ की तो सोचिये जो खतरे में है, वेंटीलेटर पर जाने ही वाला है

सरकार, उस मरीज़ की तो सोचिये जो खतरे में है, वेंटीलेटर पर जाने ही वाला है
एक मित्र से फ़ोन पर चर्चा हो रही थी. मोदी और उनके मुसलमानों के प्रति एप्रोच और हिन्दू हितों पर उनके स्टैंड के बारे में उन्होंने एक बहुत तार्किक बात कही – “डॉक्टर साहब, आप अगर किसी हस्पताल में मरीज़ देखते हैं तो हिन्दू मरीज़ भी देखते हैं, मुसलमान को भी देखते हैं… तो आप मुसलमान को खराब इलाज या गलत दवाई तो नहीं दीजियेगा ना… जैसे आप प्रोफेशन की मर्यादा से बंधे हैं, वैसे ही मोदी पद की मर्यादा से बंधे हैं… रहना भी चाहिए… प्रधानमंत्री रहते हुए सबका ख्याल रखना उनके संस्कार हैं… इसको सेक्युलरिज्म मत समझिये…”
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यहाँ तो दबे पड़े हैं कई सिकंदर

यहाँ तो दबे पड़े हैं कई सिकंदर
इंग्लैंड आया था तो मेरे पास नोकिया 1100 हुआ करता था. तब लोगों के हाथ में तरह तरह के फ़ोन देखे. उस समय भारत में उतने तरह के फ़ोन नहीं दिखा करते थे. तब फ़ोन पर इंटरनेट का लालच हुआ, एक स्मार्टफोन की सख्त जरूरत महसूस होने लगी. धर्मपत्नी ने एनीवर्सरी पर एक iphone खरीद कर देने की पेशकश की. वो iphone 4 का जमाना था. Iphone 4 नया नया आया था… सीने पर पत्थर रख कर खरीद लिया. बहुत खुशी मिली, बहुत इतराया…भारत में एक सीनियर को एक मेल किया. मेल का विषय तो याद नहीं, पर मेल के आखिर में जुड़ जाता था sent from my iphone
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डॉक्टर साहब को फुरसत मिलेगी तो इधर भी देखेंगे, आज नहीं तो शायद 2019 के बाद देखेंगे

डॉक्टर साहब को फुरसत मिलेगी तो इधर भी देखेंगे, आज नहीं तो शायद 2019 के बाद देखेंगे
मैंने भारत में कुल चौदह वर्ष डॉक्टरी की है… अभी सात वर्षों से इंग्लैंड में काम कर रहा हूँ. भारत में पूरी मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेज़ी में ही होती है, मूलतः इंग्लैंड की किताबें हमारे मेडिकल सिलेबस की रीढ़ हैं. फिर भी इंग्लैंड की स्वास्थ्य सेवाओं में और भारत की सुविधाओं में दिन रात का अंतर है.नहीं, यह अंतर सिर्फ संसाधनों का अंतर नहीं है. यह सरकारी और प्राइवेट व्यवस्थाओं का अंतर भी नहीं है. दोनों जगह स्वास्थ्य सेवाओं की फिलोसॉफी में मूलभूत अंतर है, जो दोनों सभ्यताओं के बीच का मूल मनोवैज्ञानिक अंतर है.यहाँ
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हमारे असंतोष के स्वरों को अपने लिए अवसर न समझें आपिये, वामिये और कांग्रेसी

हमारे असंतोष के स्वरों को अपने लिए अवसर न समझें आपिये, वामिये और कांग्रेसी
पिछले कुछ दिनों से संवाद का दायरा बढ़ा है. नए-नए मित्र बन रहे हैं. संयोग से इस दौरान मेरा टोन भी कुछ बदला है. विरोध और आलोचना का स्वर ज्यादा मुखर हो गया है. तो यह मोदी विरोधी टोन कुछ अलग तरह के लोगों को आकर्षित कर रही है. बहुत से आपिया मनोवृति के, वामी कुंठित लोग भी जुड़ रहे हैं, मोदी विरोध ही जिनका कुल वैचारिक आधार है. यह लेख मूलतः उन नए मित्रों की अपेक्षाओं को संबोधित है.मित्रवर! मोदी से मेरा विरोध या मोदी की आलोचना का मेरा सिर्फ एक आयाम है कि मोदी ने ‘हिंदुओं के लिए’ क्या किया?मैं यह नहीं कहता
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यह सोच आपके पीछे-पीछे चल रहे हैं, कि कभी आपके पास वो लाठी हुआ करती थी

यह सोच आपके पीछे-पीछे चल रहे हैं, कि कभी आपके पास वो लाठी हुआ करती थी
आप रात के 11 बजे कहीं से लौट रहे हैं. बस स्टैंड पर उतर कर पैदल ही घर की ओर जा रहे हैं. रास्ते में 8-10 कुत्ते आपको देख कर भूँकना शुरू कर देते हैं. आप उन्हें इग्नोर कर के आगे बढ़ते हैं तो वे और आक्रामक होकर आपकी ओर बढ़ते हैं. आप एक पत्थर उठा लेते हो और सारे कुत्ते पीछे हट जाते हैं. आप वह पत्थर हाथ में लिए उनकी ओर ताने आत्मविश्वास के साथ बढ़ते रहिये, कुत्ते पीछे खिसके रहेंगे और फिर वापस लौट आएँगे.आपको शायद वह पत्थर सचमुच चलाना ना पड़े, सिर्फ हाथ में उठाया पत्थर और तानने की मुद्रा ही वह deterrent है जो
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पूछो, खोजो, जानो, सिर्फ सूखा विश्वास करना तो मूर्खों का काम है

पूछो, खोजो, जानो, सिर्फ सूखा विश्वास करना तो मूर्खों का काम है
मुझे उन भारतीय बच्चों के लिए बहुत चिंता होती है जो भारत से बिल्कुल कटे भी नहीं है… और जुड़ने का कोई कारण भी नहीं खोज पाते. मेरे बच्चे भी कुछ कुछ इसी वर्ग में आते हैं… हमारे सारे प्रयासों के बावजूद…नहीं, मैं उन लोगों की बात नहीं कर रहा जो भारत से और अपने मूल से एक घृणा के साथ बड़े होते हैं. जिन्हें हिन्दू संस्कारों से वितृष्णा है… जो कृष्ण का क्रिस और विकास का विक कर लेते हैं… पहचान छुपाने के लिए.मैं उनकी बात कर रहा हूँ जो हिन्दू संस्कारों के बीच, हिन्दू रीति रिवाजों को मानते हुए, हिन्दू पहचान के स
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कितना भी और कहीं भी संघर्ष हो, इस्लाम को कहां है नुकसान!

कितना भी और कहीं भी संघर्ष हो, इस्लाम को कहां है नुकसान!
लोग बाग अक्सर कहते हैं कि आतंकवाद का शिकार सबसे ज्यादा मुस्लिम ही है… मुस्लिम ही मर रहे हैं… अमेरिका ने ही मुस्लिमों की ज़मीन पर हमला कर रखा है… उन्हें ही हर जगह से खदेड़ा जा रहा है… इसी पर कुछ लोग दुख व्यक्त करते हैं, कुछ खुश भी होते हैं…पर मुझे दोनों का ही आंकलन गलत लगता है… दोनों ही गणित आप अपनी ओर से लगा रहे हैं… इसे आप इस्लाम के पक्ष से नहीं देख पा रहे…इस्लाम की नज़र से देखिए… यह दुनिया, और इस दुनिया में इंसानी जिंदगी का अस्तित्व इस्लाम की नज़र में झूठा है, आभासी है. असली ज़िन्दगी तो कहीं और है…
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खुद ही खोजना, जीना, पाना होता है, बुद्ध, शंकर, विवेकानंद, ओशो कोई आपके साथ नहीं चलता

खुद ही खोजना, जीना, पाना होता है, बुद्ध, शंकर, विवेकानंद, ओशो कोई आपके साथ नहीं चलता
मेरे बेटे का नाम है सिद्धार्थ. यह इस पीढ़ी के सबसे पॉपुलर नामों में से एक है. पर मैंने उसका नाम सोचा था उसके जन्म से कम से कम 10 साल पहले. यूँ तो सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के नाम के रूप में ख्याति पाता है, पर मेरे लिए इस नाम की प्रेरणा थी जर्मन लेखक हरमन हेस की पुस्तक सिद्धार्थ.एक समय मैंने यह पुस्तक लगातार 8-10 बार पढ़ी थी… और इस पुस्तक का केंद्रीय चरित्र सिद्धार्थ, बुद्ध नहीं है, पर बुद्ध का समकालीन है. इस उपन्यास का बालक सिद्धार्थ बचपन में अपने पिता का घर और गुरुकुल छोड़ कर जंगल में चला जाता है और तपस
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